Subhash Chandra Bose: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वीर नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सुनते ही आज भी हर भारतीय के मन में उत्साह और जोश भर जाता है. आज नेताजी की 129वीं जयंती मनाई जा रही है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की. इस दिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है.
राष्ट्रपति मुर्मू दी श्रद्धांजलि
राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के स्वतंत्रता के आह्वान ने लाखों भारतीयों में साहस, आत्मविश्वास, एकता और राष्ट्रवाद की भावना को जगाया. राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने आज़ाद हिंद फौज के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक नेतृत्व प्रदान किया और इसे वैश्विक मंच तक पहुंचाया. मुर्मु ने कहा कि नेताजी की विरासत प्रत्येक भारतीय को हमेशा प्रेरित करती रहेगी.
उपराष्ट्रपति ने दी ये जानकारी
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का निडर नेतृत्व, अदम्य साहस और भारत की स्वतंत्रता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पराक्रम का सच्चा सार है. उपराष्ट्रपति ने कहा कि वे आने वाली पीढ़ियों को साहस, बलिदान और राष्ट्रीय एकता के आदर्शों को कायम रखने के लिए प्रेरित करते रहेंगे.
निडर नेतृत्व और अटूट देशभक्ति के प्रतीक-पीएम मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज के दिन देशवासी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और राष्ट्र के प्रति अद्वितीय योगदान को स्मरण करते हैं. श्री मोदी ने कहा कि वे निडर नेतृत्व और अटूट देशभक्ति के प्रतीक थे तथा उनके आदर्श आने वाली पीढ़ियों को एक मजबूत देश के निर्माण के लिए प्रेरित करते रहेंगे. श्री मोदी ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से नेताजी के सम्मान में देश भर में शुरू की गई कई पहलों का उल्लेख किया.
प्रधानमंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी के मध्य में इंडिया गेट के निकट नेताजी की भव्य प्रतिमा की स्थापना गुलामी की मानसिकता को त्यागने तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि लाल किले में स्थित क्रांति मंदिर संग्रहालय में नेताजी बोस और भारतीय नौसेना से संबंधित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री मौजूद है.
मोदी ने 2018 में लाल किले में आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ को याद किया. उन्होंने यह भी कहा कि उसी वर्ष तीन प्रमुख द्वीपों का नाम भी बदला गया था, जिनमें रॉस द्वीप भी शामिल है, जिसका नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप कर दिया गया था.
जन्म और प्रारंभिक जीवनी
सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था. वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और उन्होंने कठिन मानी जाने वाली ICS (इंडियन सिविल सर्विस) की परीक्षा पास की थी, लेकिन देश सेवा के लिए उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी ठुकरा दी.
राजनीति में रखा कदम, पर कांग्रेस के साथ रहे मतभेद
बोस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत इंडियन नेशनल कांग्रेस से की और इसमें अलग-अलग पद पर तेजी से आगे बढ़े. उन्हें 1938 (हरिपुरा) और 1939 (त्रिपुरी) में कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया. हालांकि, बोस और वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद उभरे, खासकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन संघर्ष और सशस्त्र प्रतिरोध के उपयोग को लेकर. जहां महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने अहिंसा पर जोर दिया, वहीं बोस का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए तत्काल और निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता है. इन मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया.
आजाद हिंद के गठन के साथ तेज किया स्वतंत्रता संग्राम
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, बोस 1941 में ब्रिटिश निगरानी से बच निकले और औपनिवेशिक शासन को चुनौती देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मांगा. जर्मनी में काम करने के बाद, वह दक्षिण पूर्व एशिया चले गए, जहां उन्होंने जापानी समर्थन से भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) का नेतृत्व संभाला.
1943 में, उन्होंने आजाद हिंद की अंतरिम सरकार के गठन की घोषणा की और भारत की संप्रभुता के दावे पर जोर दिया. हालांकि, INA का सैन्य अभियान अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इसका गहरा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ा, जिससे पूरे देश में राष्ट्रवादी भावना मजबूत हुई.
उनका जोशीला नारा, “तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा” भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे शक्तिशाली नारों में से एक बना.
कैसे हुई मृत्यु
जब 1945 में जापान ने आत्मसमर्पण किया, तो बोस मंचूरिया (जापानी कब्जे वाले चीन में) जाकर सोवियत सेना से संपर्क करना चाहते थे. उन्होंने वियतनाम के साइगॉन से एक जापानी बमवर्षक विमान में सवार होकर मंचूरिया जाने का फैसला किया. विमान ने ईंधन भरने के लिए ताइवान में ठहराव लिया. लेकिन, उड़ान भरने के तुरंत बाद ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसके परिणामस्वरूप बोस की मृत्यु हो गई.
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