भारत को संगठित और बलसंपन्न बनाने के लिए अपने इतिहास, अस्मिता और स्वभाव को समझना जरूरी: मोहन भागवत

Maharashtra: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में अपने विजयादशी संबोधन में स्व की भावना पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को संगठित और बलसंपन्न बनाने के लिए अपने इतिहास, अस्मिता और स्वभाव को समझना जरूरी है। संघ प्रमुखने अपने संबोधन में रिजीम चेंज का जिक्र करते हुए कहा कि इससे परिस्थिति बदलेगी, ऐसा कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बदलेगी, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं। पहले नहीं हुआ है, आज भी नहीं हुआ है। अपने स्वार्थ का पोषण करने वाले अपने पिट्ठू सब जगह प्रभावी रहे।

उन्होंने कहा कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद अपने स्वार्थों को पूरा करने वाली ताकतें और उनके समर्थक अलग-अलग जगहों पर प्रभावी बने रहते हैं। मोहन भागवत ने आरोप लगाया कि दुनिया में कुछ ताकतें अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए काम करती हैं। उन्होंने कहा कि भारत का मजबूत होना ऐसी गतिविधियों के लिए चुनौती बन सकता है। इसी वजह से भारत को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कमजोर करने और तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। 

स्व की भावना हमारी एकता का आधार                       

इससे पहले अपने संबोधन के शुरुआत में संघ प्रमुख ने कहा कि हमारी जो हम भावना है, वो जो हमारा स्व है, वो हमारा भावनात्मक बंधन है। इसी के चलते इतनी सारी विविधताओं से भरा हुआ देश प्राचीन समय से एक राष्ट्र के नाते चलते आया है। क्योंकि हमारे पूर्वजों के पास संपूर्ण अस्तित्व के एकता की एक अनुभूति थी। इसी अनुभूति के आधार पर अपनेपन का व्यवहार करने वाले अनेक सोपानों से बने हुए उत्कृष्ट तत्त्वज्ञान के भी हम विरासतदार हैं। लेकिन हम इसको भूल गए, तब हमारा पतन हुआ। हम विभाजित और दुर्बल हो गए और फिर इतने नीचे गिरते चले गए कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी हमको झेलनी पड़ी। अब उस गुलामी से हम अनेक महापुरुषों के भीम प्रयासों के बाद और बलिदानों के बाद मुक्त होकर अपनी एकता और प्रगति के राह पर चल पड़े हैं।

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