Teachers Day 2026: भारतीय परंपरा में गुरु केवल किताबों का ज्ञान देने वाला नहीं होता, बल्कि वह शिष्य को सही और गलत के बीच फर्क समझाने और जीवन की राह दिखाने का काम भी करता है। इसी वजह से गुरु को बेहद ऊंचा स्थान दिया गया है। बता दें कि संत कबीरदास ने अपने दोहों में गुरु की महिमा और शिष्य के समर्पण को बेहद सरल और गहरे शब्दों में समझाया है। आज शिक्षक दिवस के मौके पर पढ़िए संत कबीर के वे प्रसिद्ध दोहे, जिनमें गुरु के महत्व से लेकर उनकी सीख और मार्गदर्शन तक की बात कही गई है।
जानिए गुरु की महिमा
भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान और मार्गदर्शन का आधार माना गया है। संत कबीरदास ने गुरु के महत्व को अपनी वाणी में विशेष स्थान दिया है।
गुरु अमृत समान संत कबीर के दोहे
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
यदि इंसान का जीवन मोह, लोभ, क्रोध और दूसरी सांसारिक कमजोरियों से घिरा रहता है। वहीं गुरु का ज्ञान अमृत समान है, जो इन बुराइयों से बाहर निकलने का रास्ता दिखाता है। इसलिए सच्चा ज्ञान पाने के लिए किया गया बड़ा से बड़ा त्याग भी कम माना जाना चाहिए।
गुरु की शरण
कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥
इस दोहे में कबीर का कहना है कि गुरु को सामान्य व्यक्ति समझकर उनकी अहमियत को नकारना अज्ञानता है। गुरु को वह ऐसी शरण बताते हैं, जो कठिन समय में भी सही राह दिखा सकती है। उनके अनुसार, अगर ईश्वर रूठ जाएं तो गुरु शरण देता है, लेकिन गुरु रूठ जाए तो व्यक्ति को कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता है, मतलब बिना गुरु कृपा के उसका कभी भला नहीं हो सकता।
गुणों की कोई सीमा नहीं
सब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय॥
कबीर गुरु के गुणों की विशालता बताते हुए कहते हैं कि अगर पूरी धरती कागज, सारे जंगल कलम और सातों समुद्र स्याही बन जाएं, तब भी गुरु की महिमा को पूरी तरह शब्दों में लिख पाना संभव नहीं है।
गुरु कुम्हार जैसा
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
कबीर गुरु और शिष्य के रिश्ते को कुम्हार और मिट्टी के घड़े से जोड़ते हैं। जिस तरह कुम्हार घड़े को आकार देते समय बाहर से चोट करता है लेकिन अंदर से सहारा भी देता है, उसी तरह गुरु शिष्य की गलतियां सुधारता है। उनकी डांट और अनुशासन के पीछे भी शिष्य के भविष्य को बेहतर बनाने की भावना होती है।
गुरु के बिना ज्ञान नहीं
गुरु बिन ज्ञान न ऊपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥
इस दोहे में कबीर का संदेश है कि गुरु के मार्गदर्शन के बिना इंसान के लिए सच्चाई को समझना और अपनी कमियों को पहचानना कठिन हो सकता है। गुरु की सीख व्यक्ति को अपने दोषों को दूर करने और बेहतर जीवन की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।