Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि धर्मग्रन्थों में लिखा है कि- यदि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक परात्पर ब्रह्म भगवान् श्री गणेश जी प्रसन्न हो जायें तो सब कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो जाता है और यदि अप्रसन्न हों तो साक्षात् विश्व के स्रष्टा ब्रह्मा जी भी किसी कार्य को करने में असफल हो जाते हैं। भगवान् श्री गणेश जी सुमिरण से प्रसन्न हो जाते हैं।
अप्रसन्नता का कारण है विस्मरण। कोई भी कार्य करने में भगवान गणेश को भूल जाना, यह अच्छा नहीं है। भगवान श्री गणेश जी साक्षात् परात्पर ब्रह्म है।श्रीगणेशजी के प्राकट्य की कथा तो अन्यत्र भी मिलती है। परन्तु विस्तार के साथशिवपुराण,स्कन्दपुराण और ब्रह्मवैवर्तपुराण में उपलब्ध है। श्रीगणेशपुराण में तो पूराश्रीगणेशजी का आख्यान है। वे ही जगत के सृष्टि,पालन और संहार के कर्ता कहे गये हैं। सारा जगत उन्हीं से उत्पन्न होकर प्रलयकाल में उन्हीं में तिरोहित हो जाता है।
श्रीशिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेशजी का प्राकट्य उबटन से हुआ।श्रीब्रह्मवैवर्तपुराण के गणपति खण्ड में वर्णन है कि श्रीशिवपार्वती विवाह हुआ। बहुत दिन बीत गया, कोई सन्तान नहीं हुई, बहुत दिनों बाद तक सन्तानाभाव के कारण श्रीशिवपार्वती द्वारा श्री कृष्ण जी का व्रतकिया गया,जिससेश्रीगणेशजी का प्राकट्य हुआ। शनि की दृष्टि पड़ने से उनका सिर कटकर गिर गया। पुनः भगवान विष्णु ने उनके धड़ से हाथी का सिर जोड़ दिया।
भगवान गजानन प्रगट हो गये।श्रीस्कन्दमहापुराण के अनुसार एक समय शिव जी से वर प्राप्त करके असुर अजेय हो गये। तब देवों की प्रार्थना पर श्री शंकर जी का तेज माता पार्वती के यहां बालक रूप में उत्पन्न हुआ। उनका नाम विघ्नेश्वर पड़ा। भगवान श्री गणेश जी का उत्सव महोत्सव मनाने से जीवन की विघ्न बाधएं समाप्त होती है।भक्त का मंगल होता है।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).