Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि श्रद्धा का महापर्व छठवां दिवस-श्राद्ध का बहुत बड़ा महत्व है। भगवान राम ने स्वयं श्राद्ध किया। इसलिए हमारे आचार्यों ने कहा- ‘ रामादि वत वर्तितव्यं’ ये नहीं कहा अन्य के समान आचरण करो। कहा राम के समान आचरण करो। राम जी ने जैसा आचरण किया वैसा आचरण हमें करना चाहिए।
श्रीनारदपुराण में यह कथा है कि-श्री राम जी गया में श्राद्ध करने गये। तो उनके पिताजी प्रकट हो गये। पिण्डदान ग्रहण करने के लिए उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया। तो राम जी ने कहा पिताजी पिण्डदान तो मैं आपको ही दूंगा लेकिन आपके हाथ में नहीं दूंगा। क्यों? क्योंकि शास्त्र यह कहता है कि- ‘ कुशो परिपिण्डं दद्धयात् ‘दर्भ के ऊपर पिण्डदान किया जाता है।
पहले बालू की वेदिका बनाई जाती है। फिर वेदिका का शोधन होता है। फिर रेखाकरण होता है।
रेखाकरण करने के बाद, उस पर दर्भ का आश्रण होता है। दर्भ का आश्रण करने के बाद, अमनेजन देने के बाद, तब पिण्डदान दिया जाता है। शास्त्र ये कहता है, राम जी ने कहा शास्त्र की विधि ये कहती है- ‘कुशो परिपिण्डं दद्ध्यात्’ कुश पर पिण्डदान करूंगा। आपके हाथ पर पिण्डदान नहीं करूंगा, ये शास्त्र की निष्ठा देखकर देवता प्रसन्न हो गए। देवताओं ने राम जी पर पुष्प की वर्षा की। ये शास्त्र निष्ठा की निष्ठा होनी चाहिए। प्रत्यक्ष पिता प्रकट थे लेकिन हाथ पर पिण्ड नहीं दिया। क्योंकि शास्त्र कहता है कुश पर पिण्डदान दिया जाय, तो कुश पर पिण्डदान दिया। ये शास्त्र की निष्ठा ही धर्म है। हम अपने मन से कुछ भी कर लें और हमारा मन मान ले ये धर्म है तो वह धर्म नहीं होगा। शास्त्र जो कहेगा, हम उस विधि का पालन करेंगे, वो धर्म होगा। क्योंकि धर्म क्या है?
वेद प्रहणितो धर्मः वेदा धर्मो हि निर्वभौ। वेद ही धर्म का मूल है।वेद शास्त्र जो कहे, उस विधि का पालन करे, इसी का नाम धर्म है।
श्री राम जी ने गया में पिण्डदान किया और विधि पूर्वक किया। वहां यह भी कथा है कि श्री दशरथ जी प्रसन्न हुए और राम जी को आशीर्वाद दिया और कहा पुत्र तुम्हारा राज्य विलक्षण और अखण्ड होगा। और जब तुम अपनी लीला का संवरण करके जाओगे तो अयोध्या के सभी प्राणी तुम्हारे साथ तुम्हारे धाम को प्राप्त करेंगे, यह मेरा आशीर्वाद है। यही आशीर्वाद दिया राम जी को। यद्यपि राम जी सर्वसमर्थ हैं। वो अपने संकल्प से दुनियाँ के समस्त प्राणियों का कल्याण करने की सामर्थ्य रखते हैं। परन्तु पितरों के प्रति श्रद्धा रखने का क्या परिणाम है, यह बताने के लिए ऐसी लीला हुई।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).