पितरों के रूप में भगवान नारायण ही हमारी सेवा को करते हैं स्वीकार: दिव्य मोरारी बापू

Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि पितरों का महापर्व चौदहवां दिवस÷पितर का मतलब केवल हमारे जो पूर्वज हैं, वही पितर नहीं है। अनन्त लोकों में एक पितृलोक है। पितृलोक में रहने वाले जो दिव्य पितृ होते हैं।वह दिव्य पितृ स्वयं भगवान है- ‘ पितृ रूपी जनार्दनः।’ पितृ रूपी जनार्दन भगवान का ही पूजन होता है।

एक व्यक्ति ने इस विषय में संत से प्रश्न किया कि- गीता में भगवान ने कहा है कि- देवताओं को भजने वाले देवताओं को प्राप्त हो जाते हैं। मुझको भजने वाले मुझको प्राप्त हो जाते हैं। “देवान् देव यजोयान्ति मद् भक्ताः यान्ति मामपि।” पितरों की पूजा करने वाले पितरों को प्राप्त हो जायेंगे। उनको तो भगवान की प्राप्ति नहीं होगी। लेकिन पितरों की पूजा में भी भावना यही होती है कि जिन पितरों का हम पूजन कर रहे हैं उन पितरों के रूप में भगवान जनार्दन, भगवान नारायण, भगवान परमात्मा ही हमारी सेवा को स्वीकार कर रहे हैं।” पितृ रूपी जनार्दनः।”

श्रीमद्भागवत महापुराण में कथा है कि- गोकर्ण जैसे विद्वान ने धुन्धकारी के लिये गया में पिण्डदान किये, फिर भी धुंधकारी मुक्त क्यों नहीं हुआ? गोकर्ण जैसे तपस्वी ने, शास्त्रज्ञ ने, धुन्धकारी के लिये पिण्डदान किया, वह भी गया में- विधिपूर्वक, सारे विधि विधान का पालन करते हुए किया, फिर भी धुन्धकारी मुक्त क्यों नहीं हुआ?

कभी-कभी भयंकर पाप के कारण, उत्कट पाप के कारण, ऐसा होता है। बहुत बड़ा पाप होने पर श्राद्धादि कर्म करने के बाद भी उद्धार नहीं हो पाता, क्योंकि पाप प्रबल हो जाता है। पाप की प्रबलता के कारण श्राद्धादि कर्म करने पर भी कभी-कभी जीव की सद्गति नहीं हो पाती।

दूसरा कारण- जिसका पिण्डदान किया जाता है उसका नाम और गोत्र बोलकर ही पिण्डदान किया जाता है। श्राद्ध कर्म में वर्ण और गोत्र संकल्प में बोला जाता है तभी श्राद्ध मिलता है। धुन्धकारी के लिये गोकर्ण जी ने पिण्डदान आत्मदेव जी के गोत्र से किया, लेकिन धुन्धकारी आत्मदेव का पुत्र ही नहीं था। श्रीआत्मदेवजी भी नहीं जान पाये कि यह मेरा पुत्र है या नहीं है। गोकर्ण जी को भी पता नहीं, समाज के लोग भी यही जानते थे कि आत्मदेव का पुत्र है। गोत्र गलत होने के कारण वह पिण्डदान, श्राद्ध धुंधकारी को नहीं मिला। इसलिए उसका उद्धार नहीं हुआ। धुन्धकारी आत्मदेव की पत्नी धुंधली की बहन का लड़का था। धुंधली ने गुप्त रूप से उसे लिया था, किसी को पता नहीं था, उसका गोत्र अलग था।

सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).

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