Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि पितरों का महापर्व तेरहवां दिवस-पितृपक्ष पितरों का पर्व है। पितरों का महोत्सव है। वर्ष में एक बार सोलह दिन का पितरों का महोत्सव होता है। ऐसे तो पन्द्रह दिन का ही पक्ष होता है, शुक्लपक्ष-कृष्णपक्ष, पन्द्रह तिथियां होती हैं लेकिन पितृपक्ष, महालय। इसकी एक संज्ञा महालय भी है। महालयारम्भ भादों की पूर्णिमा से लेकर आश्विनमास की अमावस्या तक सोलह दिन का यह पर्व होता है। इसे महालय कहते हैं।यह पितरों का पर्व है। इस समय पितृ उत्सव मनाते हैं। क्यों? क्योंकि पितरों को यह आशा होती है कि मेरे वंश में उत्पन्न लोग श्राद्ध करेंगे। इसलिए पार्वण श्राद्ध करना ही चाहिए। और जो व्यक्ति श्राद्ध नहीं करता, पितरों के लिए पिण्डदान नहीं करता, पितरों का तर्पण नहीं करता, उसके पितर रुष्ट हो जाते हैं। वह वंश आगे चलकर रुक जाता है। वह वंश आगे नहीं चलता क्योंकि पितरों के रुष्ट होने पर वंश की वृद्धि बाधित हो जाती है और यही पितृदोष है।आज लोग पितृदोष की बातें करते हैं। पितृ दोष है क्या? आपने समय से पितरों का पूजन नहीं किया, उनके लिए विधि पूर्वक पिण्डदानादि कर्म नहीं किया। जिसके कारण से पितृ रुष्ट हो गये। उनके रुष्ट होने के कारण आपके जीवन में अनेक प्रकार के संकट और समस्याएं उत्पन्न हुईं।इसीलिए वेद भगवान की आज्ञा है- “देव पितृ कार्याभ्यां मा प्रमदितव्यं।” देवता और पितरों के कार्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए।क्या करना चाहिए इसका नाम विधि है और क्या नहीं करना चाहिए इसका नाम निषेध है। किन कर्मों का आचरण करना चाहिए, किन कर्मों का आचरण नहीं करना चाहिए, इसका ध्यान रखना चाहिए। ‘भाव मिच्छन्त देवता ‘ देवता भाव चाहते हैं।पितर हमारी क्रियाओं को और कर्मकाण्ड में होने वाले शब्दों के प्रयोग को, वाक्य की शुद्धि को चाहते हैं।’ पितरो वाक्यमिच्छन्ति।’ इससे शिक्षा मिलती है कि- हमें माता-पिता बड़ों से पितृपक्ष में श्राद्धकर्म और अन्य कर्मों की जो शिक्षा मिली है, उसका बड़ी सावधानी से पालन करना चाहिए, और जो निषेध किया गया है उसको नहीं करना चाहिए।सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).