Interesting Information: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में देश-विदेश का हर नागरिक जानता है. जब भी बापू का जिक्र होगा, उनसे जुड़े तीन बंदरों की भी बात होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन तीनों बंदरों का नाम बापू के साथ कैसे जुड़ा? माना जाता है कि ये बंदर चीन से बापू तक पहुंचे. ये तीन बंदर- बुरा न देखो, बुरा न सुनो और बुरा न बोलो- गांधीजी की सोच और जीवन दर्शन का प्रतीक बन चुके हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये तीन बंदर बापू से जुड़े कैसे?
इन तीनों बंदरों के नाम जापानी भाषा से आए
- मिज़ारू: जो अपनी आंखें ढककर रखता है, यानी बुरा नहीं देखता
- किकाज़ारू: जो अपने कान बंद रखता है, यानी बुरा नहीं सुनता
- इवाज़ारू: जो अपना मुंह ढकता है, यानी बुरा नहीं बोलता
जब चीन से आए बापू के मेहमान
माना जाता है कि ये बंदर चीन से बापू तक पहुंचे. दरअसल, देश- विदेश से लोग अक्सर सलाह लेने के लिए महात्मा गांधी के पास आया करते थे. कहा जाता है कि एक बार चीन से एक प्रतिनिधिमंडल महात्मा गांधी से मिलने भारत आया. बातचीत के बाद उन्होंने गांधीजी को भेंट स्वरूप तीन बंदरों का एक छोटा सा सेट दिया. प्रतिनिधिमंडल ने मुस्कुराते हुए कहा कि ये भले ही आकार में खिलौनों जैसे हों, लेकिन उनके देश में बेहद लोकप्रिय और प्रतीकात्मक माने जाते हैं. गांधीजी को यह उपहार इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे जीवन भर अपने पास सहेज कर रखा. यहीं से ये तीन बंदर हमेशा के लिए बापू के नाम के साथ जुड़ गए.
जापान से भी नाता
गांधीजी के इन तीन बंदरों को जापानी संस्कृति से भी जोड़ा जाता है. 1617 में जापान के निक्को स्थित तोगोशु की समाधि पर यही तीनों बंदर बने हुए हैं. माना जाता है कि ये बंदर चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के थे और आठवीं शताब्दी में ये चीन से जापान पहुंचे. उस वक्त जापान में शिंटो संप्रदाय का बोलबाला था. शिंटो संप्रदाय में बंदरों को काफी सम्मान दिया जाता है. जापान में इन्हें ‘बुद्धिमान बंदर’ माना जाता है और इन्हें यूनेस्को ने अपनी वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया है. वैसे, इन तीन बंदरों के प्यार से नाम भी हैं.
वाइज़ मंकीज़ कहा जाता है
जापान में इन तीनों को ‘वाइज़ मंकीज़’ यानी बुद्धिमान बंदर कहा जाता है. इनकी सांस्कृतिक अहमियत को देखते हुए यूनेस्को ने निक्को के इस धरोहर स्थल को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में भी शामिल किया है.
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