Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण में समुद्र मंथन की कथा है। अमृत प्राप्ति के लिये भगवान विष्णु के कहने से देवताओं और असुरों ने समुद्र मन्थन किया। समुद्र मन्थन कार्तिक मास में हुआ। कार्तिक
कृष्णपक्ष त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में अमृत कलश और आयुर्वेद शास्त्र लेकर प्रकट हुए।चौबीस अवतार में भगवान धन्वन्तरि भगवान विष्णु के बारहवें अवतार हैं। धन्वन्तरि अवतार संसार को श्रेष्ठ स्वास्थ्य प्रदान करने वाला है। हवा,जल, भोजन से तन का स्वस्थ्य, जप,तप,पूजा,स्वाध्याय और सत्संग से मन स्वस्थ्य होता है।
धनतेरस पर नये बर्तन,सोना, चांदी या अन्य धातुयें खरीदने की परम्परा है। भगवान जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथ में अमृत कलश (बर्तन) था। इस अवसर पर घर, परिवार समाज में समृद्धि और आरोग्य पाने के लिये बर्तन, आभूषण आदि खरीदते हैं। धनतेरस के दिन देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर और धन की अधिष्ठात्री देवी भगवान नारायण की प्रिया जगत की माता लक्ष्मी की पूजा का विधान है।
धनतेरस की रात को मृत्यु के देवता सूर्यपुत्र यमराज की कृपा पाने, मृत्यु के भय से बचने एवं अकाल मृत्यु से बचने के लिये यमदीप दान करने की परम्परा है, जिसमें घर के बाहर दक्षिण दिशा में दिया जलाया जाता है। एक हेम नाम के राजा थे उनके पुत्र की कुण्डली में विवाह के चौथे दिन सर्प काटने से मृत्यु का योग था। जब वह दिन आया तो उसकी पत्नी ने आयुर्वेद के देव धन्वन्तरि और धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी का पूजन किया जिससे प्रभावित होकर सर्प के रूप में आये हुये यमराज वापस गये। पूजा,पाठ से सारे प्रतिकूल अनुकूल बन जाते हैं। इससे शिक्षा मिलती है कि नित्य पूजा तो हम सबको करना ही चाहिये लेकिन विशेष अवसर पर विशेष पूजा करना चाहिये।
सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना, श्री दिव्य घनश्याम धाम, श्री गोवर्धन धाम कॉलोनी, बड़ी परिक्रमा मार्ग, दानघाटी, गोवर्धन, जिला-मथुरा, (उत्तर-प्रदेश) दिव्य मोरारी बापू धाम सेवा ट्रस्ट, गनाहेड़ा, पुष्कर जिला-अजमेर (राजस्थान).